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      नया साल आया है

 
देखो साल नया आया है
जाड़े का मौसम भाया है

छप्पन व्यंजन लगे हुए हैं-
हमने दाल-भात खाया है

ऋतु परिवर्तन जब-जब होता
ऊपर वाले की माया है

मधुरिम-मधुरिम लगता मौसम
बागों में कलरव छाया है

बिगड़े चाल-चलन का लगता
किसने उसको बहकाया है

मक्खन-बाजी जो करता है
व्यक्ति वही तो सरमाया है

नेकी फर्राटे से बोली
झूठ जरा सा हकलाया है

वह चुनाव जीता है तब, जब
पैसा जमकर बरसाया है

- अविनाश ब्यौहार
१ जनवरी २०२६

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