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     नये साल का स्वागत

 
दस्तक देतीं सर्द हवाएँ, ठिठुरन बढ़ती जाती है
अब तो रोज कुहासा ओढ़े , भोर हठीली आती है

सर्द पूस की ठंडी रातें काटे से भी कटें नहीं
नींद दूर होकर आँखों से, सारी रात जगाती है

पूछ परख अब करे न कोई, अपने घर के ए.सी. की
अब तो कंबल और रजाई, सबके मन को भाती है

मोती सी झर झर झरती है, ओस निगोड़ी पत्तों पर
लगता है कि रात खुशी से आँसू खूब बहाती है

आँख मिचौली खेले सूरज, करता रहता मनमानी
धूप गुनगुनी कभी कभी ही, आँगन में मुस्काती है

छोड़ो डरना अब सर्दी से, बोल रही दादी अम्मा
बक्से के भीतर से देखो , स्वेटर हमें बुलाती है

आग तापता रहे दिसम्बर, शॉल दुशाले में दुबका
और जनवरी नए साल का स्वागत करने आती है

- रमा प्रवीर वर्मा
१ जनवरी २०२६

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