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     नये साल का सूरज

 
खट्टी- मीठी यादें देकर, बीत गया पच्चीस
झोली में खुशियाँ भर लाया
दो हज़ार छब्बीस

जितना अपने हिस्से आया, पाकर हम हर्षाए
नए वर्ष में, नव चिंतन के, गीत सृजन के गाए
मात- पिता, गुरू, मित्र, का
बना रहे आशीष

जाने क्या-क्या सपने पाले, स्वयं को उन में ढाले
लिखकर स्वर्णिम पन्ने, हमने अनगिन ही भर डाले
हार-जीत का चक्कर छोड़ के
बने रहो इक्कीस

अंशुमान बन कर्म करें हम, नियति का श्रम पहचानें
धैर्य धार के धरा धूमती, जीवन गति यह जानें
समृद्धि के संस्कार में, नित झुका रहे यह शीश

- सरिता वाजपेयी साक्षी
१ जनवरी २०२६

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