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      शुभकामनाओं की बरसात

 
लो फिर आ गया साल नया
बस अब
एस. एम. एस. की बरसात होने वाली है
मोबाइल की घंटी, व्हाट्सऐप की टिक-टिक,
फेसबुक की दीवार— सब पर एक ही शोर,
“हैप्पी न्यू ईयर!”
“नववर्ष की शुभकामनाएँ!”
“ईश्वर करे- आपका साल मंगलमय हो!”

जिनके नाम भी हमें याद नहीं,
जिनसे साल भर हमें कोई सरोकार नहीं,
न कभी हालचाल पूछा,
न सुख-दुख बाँटा—
उनके भी संदेशों की भरमार
क्योंकि
आजकल भावनाएँ नहीं, नेटवर्क चलता है
दूसरों के भेजे संदेशों को ‘फॉरवर्ड’ करने में
एक पल भी नहीं लगता है

न शब्दों का बोझ, न आत्मीयता का पुट
बस निर्ममता से उसे दूसरे को भेज दिया जाता है
दूसरा भी तीसरे को आगे बढ़ा देता है,
फिर चौथा, पाँचवाँ—
और देखते-देखते
शुभकामनाएँ नहीं,
बस संदेशों की महामारी फैलती है

यहाँ ‘हर्र लगे न फिटकरी’ का मुहावरा सत्यार्थ होता है,
बस उँगली चली और कर्तव्य पूरा!
न नए साल का संकल्प, न आत्ममंथन की जरूरत,
बस कॉपी-पेस्ट में उलझी हुई संवेदनाओं का
उत्सव मनाया जाता है
हम फिर वहीं के वहीं —
और कह देते हैं लो
“नया साल आ गया!”

- मीरा ठाकुर
१ जनवरी २०२६

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