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      सुबह की पहली किरण

 
सुबह की पहली किरण
ले आई दस्तक नव वर्ष की
बीता वर्ष
किसी खूँटे पर टँग गया पुराने कैलेंडर की तरह

नववर्ष कोई नई आशा लेकर नहीं आया
फिर भी हम आशान्वित हैं
बहुत देर से
जाल डाले बैठे मछुआरे की तरह
नववर्ष कोई वादा नहीं करता
बस एक रिक्त पंक्ति छोड़ देता है
मैं चाहूँ तो उसमें अपने होने की पुष्टि कर दूँ

हवा बदली है पर दिशाएं वही हैं
अंतर बस इतना है कि
अब चलने की जिम्मेदारी मेरी है
नववर्ष उत्सव नहीं है, यह एक ठहराव है
चढ़ती सीढ़ी पर बीच में कुछ रुकने के लिए

मेरे भीतर आज भी अधूरा पड़ा है
जैसे कि बंद पुस्तक में मुड़ा हुआ पेज
जिसे पढ़ने की कोशिश लगातार जारी है
विगत और आगत का यह सिलसिला चलता रहता है
तब तक जब तक हम उठ कर चलने का
प्रयास न करने लगें

- संजय सुजय बासल
१ जनवरी २०२६

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