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      नया छब्बीस आया है

 
समय के पंख पर बैठा, नया छब्बीस आया है
जगा कर स्वप्न को सारे,
सबेरा मुस्कुराया है

कहे पच्चीस हौले से, करोगे तुम विदा हमको
व्यथित यह सोच कर हूँ मैं, बदल पाए कहाँ तुमको
लगा कर आस तिथियों ने
सदा हृद को रुलाया है

सुरा में डूबकर रातें, करेंगी भोर का स्वागत
बधाई शोर में दबकर, भरेगी अंक में आगत
नया जब देहरी पर है
कहाँ दीपक जलाया है

लिए सब आस की गठरी, भरें संकल्प से झोली
कहानी पर पुरानी हो, रहेगी रिक्त ही खोली
रहें मंगल करें मंगल,
सुकर्मों को बताया है

कुचल कर सब विकारों को, नवलता हर्ष ले आए
जगा दे चेतना सारी, सुखद उत्कर्ष ले आए
धरा नित खिलखिलाती हो
यही सपना सजाया है

- अनिता सुधीर आख्या
१ जनवरी २०२६

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