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      फिर कैलेंडर से दिसंबर

 

फिर से कुहरा धुंध बनकर छा रहा है
फिर कैलेंडर से दिसंबर
जा रहा है

चल रही हैं बर्फ सी ठंडी हवायें
काँपती हैं अनमनी चारों दिशायें
सूर्य अपनी कैजुअल
निपटा रहा है

गेहुओं में बचपना आने लगा है
राग सरसों प्रेम का गाने लगा है
आग आशा की कृषक
सुलगा रहा है

अनुभवों की चाक पर बीते हुये दिन
श्वेत से कुछ श्याम से रीते हुये दिन
सांकलें नववर्ष फिर
खटका रहा है

- धीरेंद्र द्विवेदी
१ जनवरी २०२६

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