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      आ गया नव वर्ष

 
आ गया नववर्ष फिर
स्वागत करो, स्वागत करो

बर्फ की चादर में शायद गुनगुनी सी धूप हो
जो छिपा है अंधेरे में चाँदनी का रूप हो
नाम जीवन उम्मीदों का
भविष्यत से मत डरो

चलते रहें पग थकन की किंचित भी न अनुभूति हो
राह के कंटक बुहारें नित नवल मृदु नीति हो
उमगती-सी उमंगों में
रंग कुछ ऐसे भरो

उग रहा है नया सूरज काट कर कोहरे की परतें
लक्ष्य पाने की दिशा में राह की होती न शर्तें
कठिन हो या सुगम हो
किन्तु शुभ पथ ही वरो

- मधु प्रधान
१ जनवरी २०२६

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