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     सूर्य के दस्तक लगाना

 
सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है

व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो
कुंद होती दिख रही हो वेग की गति
और कर्कश वक्त
केंचुल छोड़ता हो

साधना जब
शौर्य का विस्तार चाहे
उग्र का पर्याय तब
खोया हुआ है

धूप के दर्शन नहीं हैं,
धुंध है बस
व्योम के उत्साह पर
कुहरा जड़ा है
जम रहा है आँख का पानी निरंतर
काल यह संक्रांति का
औंधा पड़ा है

अब प्रतीक्षा क्यों, शलाका हाथ ले लो
कोड़ दो संसार
तम बोया हुआ है

- सौरभ पाण्डेय
१ जनवरी २०२६

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