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        जश्न कैसा हो रहा

 
जश्न कैसा हो रहा है, गूँजती सारी दिशाएँ
बढ़ रहे उन्माद के कटु शोर से
भारी दिशाएँ

है भला नववर्ष कैसा जब नया कुछ भी नहीं है
छोङकर अब तक पुरातन तो गया कुछ भी नहीं है
देख लो अब भी ठिठुरता हाड़ उसका ठंड से है
काँपता हर रोम उसका ईश के इस दंड से है
वेदना के नीर से तो हैं सभी
खारी दिशाएँ

स्वर अगर संवेदनाओं के मुखर तुम आज करते
दीन की हर भित्ति को फिर देखकर तुम आह भरते
सोचते फिर तुम ठहरकर जश्न क्योंकर हम मनाएँ?
क्यों भला मुख मोङ निर्धन से जहाँ अपना सजाएँ?
दर्द उठता तब हृदय में देख
अँधियारी दिशाएँ

वर्ष होगा हर्ष का तब जब मिलें सबको निवाले
सूर्य भी खींचे अगर इस झोंपङी से रंग काले
पूस की इस रात में ठिठुरे न 'हलकू' और कोई
निर्वसन बे आसरा को काश मिलता ठौर कोई
कर सके शुचि प्रेम का इक दीप
उजियारी दिशाएँ

- कविता काव्या सखी
१ जनवरी २०२६

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