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      नये वर्ष की ओर

 

देख रहे सब आस लगाकर आते
नये वर्ष की ओर

सर्द हवाओं का मौसम है
धरती भी होती कुछ नम है
लेकिन पत्ते झड़े जा रहे
दूर दूर तक उड़े जा रहे
फिर भी मन में चाह जगी है
होगी नये वर्ष की भोर
.
बर्फ गिरेगी हिम शिखरों पर
हवा चलेगी फर फर फर फर
नव श्वेत आवरण धरती का
भाव जगा देगा मस्ती का
धूप खिलेगी उजली उजली
नाच उठेगा मन का मोर

नये नये उपहार लिए सब
आपस में मिलते हैं जब जब
हर्ष और उल्लास भरे मन
खिल उठते खुशियों के मधुबन
मौन हृदय के मृदु भावों में
जैसे थम जाता है शोर

खाना पीना खुशी मनाना
सबको मिलकर गले लगाना
रीत युगों से चली आ रही
और सभी को खूब भा रही
अपने मन की सब कर लेते
मन पर कब चल पाता जोर

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ जनवरी २०२६

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