अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

   यों ही बीत जा रहीं सदियाँ

 

यों ही बीत
जा रहीं सदियाँ, एक एककर वर्ष सभी
पल हैं धरे सहेजे अनगिन
जीवन के संघर्ष सभी

आना अपने संग
लिए तुम उस अतीत की गठरी को
सहज प्रीति सँग सरस वारुणी की रसवंती गगरी को
सारे दर्द हमारे अपने और
तुम्हारे हर्ष सभी

तजकर के
निश्चिन्त हो गए अपने राग-द्वेष सारे
मुक्त गगन में ज्यों विलुप्त हों उषाकाल चंचल तारे
समिधाओं संग जले हवन में दर्द,
दम्भ, अपकर्ष सभी

यद्यपि कभी
शेष है कितना गंगा में जल, बहने को
रंच न पश्चाताप कहीं है नहीं बचा कुछ कहने को
जो करने थे समय चक्र संग पूरे
हुए विमर्श सभी
-
दरवाजों के
भीतर चर्चित होती यहाँ महफिलें हैं
चलने का है नाम जिंदगी छलनामयी मंजिलें हैं
देख लिए उत्तुंग शिखर के पतन
और उत्कर्ष सभी

- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल
१ जनवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter