अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

आ रहा नव वर्ष
 

भ्रष्टता की
धुन्ध में डूबा हुआ नव वर्ष
आ रहा लेकर नया
अहसास

एक असमंजस
नयन में आँक कर
आ रहा
भीषण समय को लाँघ कर
कुछ खरोंचें देह पर
आतंक की
किन्तु चेहरे पर नया
उल्लास

वक्त की
प्रतिकूलता को जान कर
बैठकर
आया नहीं नभयान पर
सफर बस का भी
नहीं वश में
क्योंकि जरजर है सड़क
इतिहास

कर सका
न रेलयात्रा आज तय
विषखुरानी का
रहा हो स्यात भय
आ रहा पैदल मगर
स्मित अधर
पांव में पहने हुए
आकाश

पं. गिरिमोहन गुरु
३१ दिसंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter