अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

शुभकामना
 

सबके मन
मधुबन हों प्रीत के प्रसून खिलें
जन जन के जीवन में एक नई भोर हो।

हरी भरी
'होरी' के खेतों की गोद रहे
फसलों के पाँव रहें भारी इस साल में।
कुटिया के चूल्हों की
आँच नहीं मद्धिम हो
'धनिया' के
चौके पे रोटी हो थाल में।
सिक्कों के दानों से पेट भरे जेबों का
मोद और मंगल का वास ठौर ठौर हो।

सावन के
आँगन में बरखा नचनियाँ सी
सौ सौ बल खावे मेघ मिरदंग की ताल पर।
फागुन की बगिया में
खिल खिल बसंत हँसे
कोयल की
ताल मधुर गूँजे रसाल पर।
ड्योढ़ी मुंडेरों पर चुनमुन हो चिड़ियों की
सरिता सरोवर में जल की हिलोर हो।

रामशंकर वर्मा
३१ दिसंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter