अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अलविदा वर्ष...
बेसूरत वक़्त से गुजरते हुए
 

हम रोज-बरोज़
एक मरे हुए दिन की खाल में
सिगरेट के सुट्टे और चाय की चुस्कियाँ उड़ेल कर
उसे ज़िंदा करने की कोशिश में लगे रहे...
आवाजों और दृश्यों को गुलाम बना कर
हमने उनकी शक्लें एक सी कर दीं
और हम उन यक-सां शक्लों के
ऊबे हुए कैदी होते रहे...

साल के कोई से एक महीने-
और माह के कोई से एक दिन से
हमने अलग सूरत और मायने खत्म कर दिए
गो कि हमने पिछले ज़माने की खुश्गरेज़ कहानियां
उससे चस्पां कर रखी हैं ...

हमने तहा कर दिमाग में रख लिए चंद नाम
किसी एक खुशबू का नाम
किसी एक स्वाद का
या कि किसी गुनगुनाहट का कोई गर्म नाम
और उन्हें बारहा दुहरा कर खुश होते रहे...

अलविदा वर्ष...
तुम माज़ी के सैलाब में गुम हो जाओ...
और हमारी बचीखुची उम्मीदों की तामीर के लिए
इन हलचलभरी लहरों पर
अब एक नए वर्ष को नमूदार होने दो...
आमीन ...

सुनील श्रीवास्तव
३१ दिसंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter