अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

वक्त बूढ़े नीम सा
 

फिर समय का देखिये, नटखट परिंदा,
अंकों के इक खेल से
बहला रहा है
पल, दिवस और माह वाला इक शिशु,
साल बन आने को अब
अकुला रहा है

वृक्ष के कुछ पात पीले,
पक रहे हैं,
झर रहे हैं
और नव पल्लव शिशु
दृग खोलने से
डर रहे हैं
कल इन्ही शाखों पे
कलियाँ खिलेंगी,
फूल शायद इसलिए कुछ हौले से
कुम्हला रहा है

वक्त की धारा कभी क्या
थम सकी है?
कोई नदिया कब मुहाने
पर रुकी है?
माना छिलता है नदी का तन
मगर, बहना तो है
है समय मुश्किल मगर संग
आस का गहना तो है
घाव सुविधाओं के दामों ने दिए जो,
वक्त बूढ़े नीम सा
सहला रहा है

-- सुवर्णा दीक्षित
३१ दिसंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter