अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अभी चीखता साल गया है
 
तुड़ी-मुड़ी चिट्ठी के जैसा
लगता साल पुराना ।

कोरा कागज बना लकीरें
कितनी आड़ी-तिरछी,
तुतली बातें लिखती गुड़िया
मन से अच्छी-अच्छी,
छोटे-छोटे सपने लेते
सुंदर रूप सलोना,
पंख लगा कर नई उड़ानें
भरते नन्हें पंछी

खिली-खिली सी धूप छेड़ती
फिर इक नया तराना।

गई रात के पट चिपका कर
खिड़की से दिन उगता,
आशाओं का छौना सूरज
अँगड़ाई ले जगता,
दूर-दूर तक झकमक राहें
नया जोश भर देतीं,
नये साल में नई मुरादें
लिये मुसाफिर चलता,

खट्टी मीठी बाँध पोटली
आगे सफ़र सुहाना।

--मानोशी
३० दिसंबर २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter