अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

एक सपना
 
आहटें बदले समय की सुन रहा है मन
एक सपना फिर नयन में
बुन रहा है मन

धर गया
कोई सिरहाने जादुई पुड़िया
फिर लगी तिनके जुटाने आस की चिड़िया
भावनाओं में हुयी कुछ सुगबुगाहट सी
गीत मौसम का नया फिर
गुन रहा है मन

गंध चिर-
परिचित लगी घुलने हवाओं में
बिम्ब सुधियों के कई उभरे दिशाओं में
बदलियाँ भ्रम की हटाकर धूप के आँगन
सीलते रिश्ते रुई सा
धुन रहा है मन

पलटती है
पृष्ठ रह-रह झील की लहरें
इन अबोले अक्षरों के अर्थ है गहरे
जिन्दगी की रेत से अनमोल मोती सा
पल मधुर अहसास का फिर
चुन रहा है मन

- मधु शुक्ला
२९ दिसंबर २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter