अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

नए वर्ष में
 
नए वर्ष में नई चुनरिया
ओढ़ उषा जब घर आएगी
पग फेरे में
नव प्रभात संग
धरती रौनक पा जाएगी

नव पुष्पित पौधों पर सजकर
शबनम के मोती चमकेंगे
उपजाऊ माटी में गिरकर
कृषकों के श्रम-बिन्दु सजेंगे
खग वृन्दों के
मृदुल गान में
वेद ऋचा भी सुर पाएगी

अबकी है यह आस हमारी
सर्पहीन चंदन का वन हो
नागफ़नी ना उगने पाए
ऐसा भारत का उपवन हो
बाँसों के
झुरमुट से आकर
तान बँसुरिया की गाएगी

नव प्रवाह में नव निनाद भर
नदियों में नव हलचल होगी
दहशत भूल हँसी की ठनगन
वामाओं में हरपल होगी
नवल चाँदनी
नव शीतलता
हौले हौले बरसाएगी

- ऋता शेखर 'मधु'
२९ दिसंबर २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter