अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

बीत गया वह वर्ष पुराना
 
जिसको हमने अपना माना
रात दिवस था आना जाना
चल दिया वो बिन किये बहाना
बीत गया वह वर्ष पुराना

कितनी दूर निकल आये हम
उसके संग संग चलते चलते
कितने सूरज देखे हमने
सुबह निकलते सन्ध्या ढ़लते
वो ही चल दिया मीत पुराना
बीत गया वह वर्ष पुराना

जिसकी आँखों में थे सपने
जिसकी साँसों में थे अपने
जिसको हमने प्रीत कहा था
हार को जिसकी जीत कहा था
टूट गया वह स्वप्न सुहाना
बीत गया वह वर्ष पुराना

कितनी मुस्कानें दी हमको
दर्द मगर चुपचाप दे गया
गठरी बाँधे चला बटोही
यादों की पदचाप दे गया
खड़ा देखता रहा ज़माना
बीत गया वह वर्ष पुराना

- सुरेन्द्र शर्मा
२९ दिसंबर २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter