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नव वर्ष अभिनंदन

सुविचार

         

मन में इसी सुविचार का सुविचार हो
सन चार में बस प्यार का संचार हो
जनतंत्र के जज़्बात को जीमें नहीं
जोगी की या जुदेव की नाराज़गियाँ
नभ में कबूतर तो दिलेरी से उड़ें
ना हो दलेरों की कबूतर बाजियाँ
कौवों का गिद्धों का न स्वेच्छाचार हो
सन चार में बस प्यार का संचार हो

रूखे पड़े दिल बेरुखी से भर गए
पड़ती नहीं है प्रेम की परछाइयाँ
सब तेल घी तो तेलगी जी पी गए
बाकी कहाँ है स्नेह की चिकनाइयाँ
चिकनाइयों पर यों ना अत्याचार हो

सन चार में बस प्यार का संचार हो

खंदक में खुंदक से किया बंधक जिसे
लो तेल लेकिन गंध गंधक की न हो
सहमे हुए दहले हुए दिल में कभी
आतंक से बढ़ती हुई धक-धक न हो
दिल में गुणों की गुनगुनी गुंजार हो
सन चार में बस प्यार का संचार हो

अशोक चक्रधर

  

मधुर गीत

नवल वर्ष का आगमन पथ सजाकर
दुखों को मिटा स्नेह सरिता बहा कर
भ्रमों को हटा सत्य का राग गा कर
बिछुड़े हुए हर हृदय को मिला कर
प्रणय पंथ में प्रेम दीपक जला कर
अरी लेखनी तू मधुर गीत लिख दें

हमारी तुम्हारी सभी की कहानी
किसी की नवल है किसी की पुरानी
कोई खो रहा आज स्मृति जगत में
कोई ढूँढ़ता आज खोई निशानी
तू कल आज की एक मूरत सजा कर
अरी लेखनी तू मधुर गीत लिख दें

खिलें आस डाली पे विश्वास कलियाँ
हों दीपित सभी अब तिमिर लिप्त गलियाँ
बनाए सभी मिल सुधड़ विश्व अपना
भवन और कुटी में हों दीपों की लडियाँ
यही आस ले आज सबको लुभा कर
अरी लेखनी तू मधुर गीत लिख दे

मिटें बैर की भावनाएँ जगत से
भुलाएँ सभी यातनाएँ विगत से
खिलाएँ सजाएँ सभी सौम्य उपवन
दिखाएँ वही पथ जो जोड़ जगत को
तू सद्भाव की आरती को बना कर
अरी लेखनी तू मधुर गीत लिख दे

भगवत शरण श्रीवास्तव 'शरण'
 

 

 

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