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नव वर्ष अभिनंदन

नव वर्ष के गुब्बारे

         

वह बेच रहा था
नव वर्ष के नए गुब्बारे खड़ा सड़क किनारे करता जीवन यापन
इसी के सहारे।

उसी से पूछ लिया
इस उत्सव का अर्थ
वह बोला
"सा'ब यह तो आप लोगों का
है खिलवाड़ करता है कोई मस्ती
और कोई कर रहा बस
पेट की भूख का जुगाड़

सा'ब बस मैं तो इसी
आस में जाग रहा
और प्रभु से माँग रहा
कि अभी न आए
बारह की घड़ी जब तक बची मेरे हाथों में

यह गुब्बारों की लड़ी।
जब बिक जाएँगे सभी मनेगा मेरा नव वर्ष तभी"

सुमन कुमार घई

 

उठी यवनिका

उठी यवनिका प्राची पर से
नई किरण लेती अंगड़ाई
नवल आस को लिए भोर नव
नए राग पर गाती आए
नया दीप है नई ज्योत्स्ना
और नया विश्वास हृदय में
यह नव वर्ष नए संकल्पों से
कर्मठता और बढ़ाए

आशंका संत्रास भ्रमित पल
परिचय के धागों से टूटें
थकन निराशा औ' असमंजस
सब ही पथ में पीछे छूटें
अंजुरि का जल अभिमंत्रित हो
पल-पल नूतन आस उगाए
और आस्था हर इक सपना
दिन-दिन शिल्पित करती जाए

जीवन की पुस्तक का यह जो
एक पृष्ठ है समय पलटता
उसका नव संदेश प्राण में
अनुष्ठान हो नूतन भरता
प्रगति पंथ की मंज़िल आकर
भित्तिचित्र बन सके द्वार पर
नये वर्ष की अगवानी में
यही कामना हूँ मैं करता।

राकेश खंडेलवाल
1 जनवरी 2006

 

 

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