अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       पतंग मेरी

 
उड़ान भरने को आतुर हुई पतंग मेरी
हवा के साथ में उड़ने चली पतंग मेरी

कोई पतंग अगर उसके सामने आये
उसे तो काट ही देगी मुई पतंग मेरी

उड़े इधर से उधर सर्र सर्र फर फर वो
है शोखियों से भरी मनचली पतंग मेरी

दिखाये उसने सदा दाँव पेंच अपने बहुत
किसी पतंग से जब भी लड़ी पतंग मेरी

सजा के रखती है अपने बदन को रंगों से
हमेशा रंग बिरंगी दिखी पतंग मेरी

किसी के सामने झुकना उसे पसन्द नहीं
मिज़ाज़ से है बड़ी नकचढ़ी पतंग मेरी

चली है नापने ऊँचाई आसमान की वो
है वाकई ये बहुत सिरफिरी पतंग मेरी

- राम अवध विश्वकर्मा
१ फरवरी २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter