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       पतंग की पुकार

 
बन गयी पतंग से खेल आज
फिर भी सुख देती हूँ अपार

मत मानो कटी पतंग मुझे
कर दूँगी अबके दंग तुझे
रहती हूँ सबके आस-पास
देकर तो देखो इक पुकार

अब बिना डोर के कागज के
मैं उड़ती हूँ मोबाइल में
छत नहीं, न शुद्ध हवाएँ हैं
फिर भी उड़ती हूँ आर पार

देखो तो मेरे विविध रंग
चालें चलने का नया ढंग
शृंगार करे बैठी हूँ मैं
चरखी-माँझे से भी करार

नहिं भय गिरने या कटने का
नहिं धूप शीत या फटने का
हर जगह उपस्थिति है मेरी
प्रतियोगिताएँ हों या त्योहार

- मधु संधु
१ फरवरी २०२१

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