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            धूप निकलने में डरती

 
धूप निकलने में डरती है हद दर्जे की सर्दी है
आवारा फिरती रातों में सूरज की नामर्दी है

आई हो तो चैन से बैठो हम कुछ तय कर ही लेंगे
कानों में घुस नाक बहा दो ये कैसी बेदर्दी है

धूप स्वेटरों में लगवा दी सूट शॉल धुलवा डाले
रुई धुनकने वाले ने इक नई रज़ाई भर दी है

सोचा था इससे लड़ने की कर लेंगे तैयारी पर
देखो इस बैरन ने कैसे हालत पतली कर दी है

बाहर बैठे जरा तापने धूप निकल आई थी तो
सर्द हवा आई धमकाती अच्छी गुंडागर्दी है

गर्म मंगोड़े खाते जाना खटिया पर बैठे बैठे
सर्दी बीते तो शर्माना चुस्त जरा सी वर्दी है

घरवाली ने झल्ला कर कुछ और नहीं जब सूझा तो
पाँच किलो भर मटर मँगा कर मुझे छीलने धर दी है

- अमित खरे
१ दिसंबर २०२४

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