अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

            तापमान गिरने लगा

 
तापमान गिरने लगा बढ़ी शीत की मार
लुकाछिपी कर धूप भी करती नित्य प्रहार

सीमा पर सैनिक डटे पारा हो यदि शून्य
हम सोते सुख चैन से वह जब चौकीदार

नहीं रजाई पास में जलते नहीं अलाव
रैन-बसेरा आस है कब देगी सरकार

मूरत पर ऊनी वसन ठिठुरा बूढ़ा गात
शीत लहर में मर गया भिक्षुक मंदिर द्वार

संबंधों में उष्णता बढ़ा रहीं संताप
प्रीति रजाई ओढ़िए लिए मनुजता सार

फंदे गिनतीं ऊँगलियॉ गपशप में थीं मग्न
काँप अकेलापन कहे दो कोई उपचार

कहीं शीत क्रीड़ा करे लिए तुहिन बौछार
रात सड़क पर सो कहीं करती नित तकरार

- अनिता सुधीर आख्या
१ दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter