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            आती हैं सर्दियाँ

 
छुप धुंध के लिबास में आती हैं सर्दियाँ
ठंडी हवा के तीर चलाती हैं सर्दियाँ

जलता अलाव सेंकने होते इकट्ठे लोग
यों दूरियाँ दिलों की मिटाती हैं सर्दियाँ

सरसों का साग मकई की रोटी या खीचड़ा
लड्डू तरह-तरह के खिलाती हैं सर्दियाँ

कितना है भेदभाव यहाँ कौन ये कहे
भाती कहीं, किसी को डराती हैं सर्दियाँ

पहनो गरम व खाओ गरम तो ही है बचाव
वरना दवाइयाँ भी पिलाती हैं सर्दियाँ

मौसम हो कैसा भी वो बदल जाता ही है 'रीत'
जाते हुए ये ही तो बताती हैं सर्दियाँ

- परमजीत कौर 'रीत'
१ दिसंबर २०२४

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