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            सुबह की ठंड

 
सुबह की ठंड में अब ओस जमती जा रही देखो
सघन है धुंध भी अब रोज बढ़ती जा रही देखो

निशा है खूब लम्बी जब निकलता देर से सूरज
तपस भी धूप की अब नित्य घटती जा रही देखो

बढ़ा ही जा रहा है बोझ तन पर गर्म कपड़ों का
अदाएँ शोख भी लेकिन निखरती जा रही देखो

कभी भी रुक नहीं सकती उड़ानें जब परिंदों की
हवा भी रुख कहाँ अपना बदलती जा रही देखो

हुआ हिमपात ऊँचे पर्वतों पर सर्द मौसम में
रजत आभा लिए कुदरत दमकती जा रही देखो

कड़कती ठंड के कारण नहीं घर से निकल पाते
जरूरी आज गतिविधियां सिमटती जा रही देखो

सभी को प्रिय बहुत पकवान गर्मागर्म इस ऋतु में
पकौड़े सूप की नित चाह जगती जा रही देखो

- सुरेन्द्रपाल वैद्य
१ दिसंबर २०२४

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