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            मिसरी अगहन मास

 
शीतकाल के चाप से निकल रहे हैं तीर
कुहरे की चादर पहन मौसम हुआ अधीर

ओस-ओस मोती झरे ठिठुर रही है रात
चंदा करे चकोर से भीगी- भीगी बात

देख गुलाबी धूप को भूल गये सब छाँव
धूप निखारे रूप को रूप निखारे गाँव

लुकाछिपी अब धूप की शरमा उठे गुलाब
साँझ ढले चौपाल पर बजने लगे रबाब

चखी मिठाई ईख की मन में भरी मिठास
उस पर बातें मीत की मिसरी अगहन मास

ओझल-बोझिल बर्फ़ है धरती पर चहुँ ओर
सन्नाटों के पल सभी लगे मचाने शोर

खुशबू की गठरी खुली, क्यारी- क्यारी फूल
कमसिन पछुवा भी चले, मौसम के अनुकूल

- पारुल तोमर
१ दिसंबर २०२४

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