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            सुबह गुनगुनी धूप

 
तन-मन झंकृत कर रही, सुबह गुनगुनी धूप
पवन ठिठक कर देखता, उसका कांचन रूप

रवि-किरणों को देखकर, खिसके तारक वृन्द
कमल-दलों से कंठ लग, बैठे हुए मिलिन्द

कम्बल अपना आस्मां, और ज़मीं कालीन
पूस-माघ छीने उन्हें, दिखा शीत-संगीन

सूर्य स्वयं दुबका पड़ा, घन का कम्बल ओढ़
जैसे बिस्तर में पड़े, हम घुटनों को मोड़

सूरज बाबा खेलते, लुका-छिपी का खेल
बूढी अम्मा को हुई, हफ़्ते-भर की जेल

दिन तो कट जाता मगर, काटे कटे न रात
खाँसी-बलगम की मिली, दादा को सौग़ात

सरसों में माहू लगा, आलू में क्षय रोग
ठण्डे पड़ने हैं लगे, पाला खाते लोग

कौड़े पर बैठे हुए, करें बतकही लोग
बिधना ने जो लिख दिया, मेटे मिटे न सोग

लिये रजाई बर्फ़ की, मन्दिर करें विचार
जाड़े-भर रहते कहाँ, बदरी और केदार ?

- राजेन्द्र वर्मा
१ दिसंबर २०२४

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