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            जाड़े की धुंध में

 
ठिठुरती चोंच
तकिये से निकला तिनका लिए
थाली भर
सूरज लेने गई
कड़छी भर अगन भी न ला सकी
साँकल खटखटाई तुषार ने
मुट्ठी भर ऊष्मा दे दो
बर्फ से सनी हवा ने गाली दी
तो तीर बने सितार के तार पर
कामुक अंगार गिरे झनझनाने लगे
अग्नि में जलता बदलता अलाव
अपना स्वरूप देख रहा था
दो प्रेमियों की धड़कन से बंधे
आईने में
पास मे ही
घोंसले की जीर्ण शीर्ण छत पर
भूखी थाली के आँसू
अपनी छवि देखते शबनम में
चूल्हे से उठते
ठंडे धुएँ की रूह खो गई
जाड़े की धुंध में।

- हरिहर झा
१ दिसंबर २०२४

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