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            लौटी सर्द हवाओं

 
अबकी बार बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को

काँप गई थी धूप
चाँदनी कितनी शीतल थी
नदिया गाढ़ी हुई
हवाएँ बेहद विचलित थीं

व्यर्थ हुए अलाव
आँच के धीमें होने से
फसलें ठिठुरी और फुनगियाँ
सहमी सहमी सी
अबकी बार बहुत दिन सहते रहे
फटी बिवाई पाँवों को
अबकी बार बहुत दिन बीते
लौटी सर्द हवाओं को

- कमलेश कुमार दीवान
१ दिसंबर २०२४

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