अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

            ठिठुरती रात
 

 
ठिठुरती रात न रजाई न कंबल
एक फटी कथड़ी को ओढ बेसुध सो रहा है
न पलंग न गद्दा न कमरा उसके पास है
खुरदुरी जमीन पर सिर्फ फुटपाथ है

वातानुकूलित कमरों में सोने वालों को
नींद की गोलियाँ खाकर भी नींद नहीं आती है
चिंता अवसाद में रात करवटों में कट जाती है

किंतु वह दिन भर
थक-हार-कर सूखी रोटियाँ खाता है
पानी पीकर
डकार लेकर, कथड़ी ओढ़ कर सो जाता है
सर्दी का मौसम हो या दहकती रात
मच्छरों की भिन भिनाहट
हो या खटमलों का हो साथ
उसकी नींद और चैन को
कोई नहीं छीन सकता है

चिंता के नाम पर उसके पास सिर्फ पेट है
अपनी मेहनत से इतना तो कमा सकता है
पेटभर रोटी खाकर
सुख की नींद सो सकता है।

- संजय सुजय बासल
१ दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter