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           शीत लहरी

 
धूप भीगी सी खड़ी है
केश खोले शीत लहरी

दिन दिखाता भाव ज्यादा
रात गहरी नींद लेती
माँ बुने फिर स्वेटरों को
सर्दियों के हाथ देती
अब पवन शीतल धरा पर
नित लगाती है कचहरी

झूमती गुलदाउदी पर
डालती जब धुंध घूँघट
आसमां ओझल हुआ फिर
सूर्य किरणे बाँधती लट
पर्वतों के स्कंध चूमे
बर्फ की सरिता सुनहरी

ठंड चंगेजी बनी है
हाड़ काँपे झोंपड़ी में
हाल सुधरेगा भला क्यों
देश उल्टी खोपड़ी में
आज उठते प्रश्न पर फिर
ये धरा ही मौन ठहरी

- अमिता श्रीवास्तव दीक्षा
१ दिसंबर २०२४

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