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           दिन हिरासत में लिया

 
यह हिमानी तीर लेकर चल रही
इस हवा ने
दिन हिरासत में लिया

नज़रबन्दी में बुढ़ापे की शरद
सिसकियाँ लेने लगी है नासिका
यह शिशिर की साँझ का है ओढ़ना
जो अलावों की गली में जा टिका
बस बसंती स्वप्न ने पैरोल पर
कुछ रिहाई का
कहीं से खत दिया

रात की तो बात बस पूछो नहीं
ओस ने आगोश में ऐसा लिया
धुंध की चादर लपेटे पेड़ के
आँसुओं ने दर्द अपना कह दिया
कँपकँपाती उँगलियों ने चाय का
चुस्कियाँ भरकर
गरम स्वागत किया

सड़क के संकेत भी गुमसुम हुए
चल रहीं चुप गाँव की पगडंडियाँ
हारकर उपवास पर बैठी हुईं
हैं मजूरों सेfपटी जो मंडियाँ
आ कहीं से मुखबरी करते हुए
बदलियों ने
रद्द होता मत दिया

- जगदीश पंकज
१ दिसंबर २०२४

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