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           धूप स्वेटर पहन कर आई

 
हवाओं में घुल रही ठिठुरन
धूप स्वेटर पहनकर आई

ओस ने गीला किया लो फूलों का तन
कँपकँपी के पाँव ने जकड़ा है तन-मन
शिराओं में
दौड़ती सिहरन
धुँध कुहरे को पकड़ लाई

खेत में फैली ख़ुशी अँकुराए हैं दिन
मेंड़ कहती कान में धरती बनी दुल्हन
मचानों पर
बैठ अपनापन
फूँकता है सगुन शहनाई

नदी बैठी घाट पर सुड़कती है चाय
रात लेकर चाँद को कहे टाटा बाय
कुनकुनी-सी
सूरज की किरन
चुभ रही काँटे सी पुरवाई

- जयप्रकाश श्रीवास्तव
१ दिसंबर २०२४

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