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            दे रहीं दस्तक

 
दे रहीं दस्तक
हवाएँ शीत की

समझ में
आने लगा है मौन का नव व्याकरण
हट रहा चेहरे से जैसे झीना-झीना आवरण
गुनगुनी सी धूप ज्यों छुअन है
मनमीत की

खिंची है नभ
से धरा तक सरल रेखा स्वर्ण की
छेड़ देती है सहज ही बीन अंतःकरण की
बाँसुरी दुहरा रही है
धुन नये इक गीत की

- मधु प्रधान
१ दिसंबर २०२४

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