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            शीत का प्रकोप

 
धूप अलसायी हुई है भोर नित धुँधला रही है
शीत का प्रकोप बढ़ रहा काया
कँपकँपा रही है

किरणे कुछ विलंब कर के अँगना उतरने आ रही
कुहासे की घनी दिवार राहों में विघ्न ला रही
साँझ से पहले ही साँझ सिकुड़ कर
सँझला रही है

दिवस तो सकुचा गये अब विभावरी तन तान रही
शाल-स्वैटर-सिगडियों बिन नींद शिथिल निष्प्राण रही
चाय कहवे की कृपा से देह कुछ
गरमा रही है

पत्तों पर हिमकण बूँदें मोतियों जैसी दमकतीं
ताल जल में पर्वतों के काँच-सी परतें चमकतीं
पाले की मार से त्रस्त फसल भी
कुम्हला रही है

- ओम प्रकाश नौटियाल
१ दिसंबर २०२४

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