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            गली यह जादू भरी

 
ओढ़कर कोहरा खड़ी है
गली यह जादू भरी है
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नमस्ते हैं, मुस्कियाँ हैं
चाय की कुछ चुस्कियाँ हैं
खबर हैं सरगर्मियाँ हैं
गजब की ये सर्दियाँ हैं
ठंड भी कसकर पड़ी है
गली गरमाहट भरी है
..
टीन की छत पर नमी है
काँच पर बूँदें जमी हैं
भाप सी साँसें उड़ी हैं
खिड़कियों से आ जुड़ी हैं
हवा उड़ने पर अड़ी है
गली उम्मीदों भरी है
.
शिशिर यह कितना निडर है
धुंध से घेरा शहर है
ठंड कुछ ऐसी जबर है
ये रजाई बेअसर है
बर्फ फिर शायद पड़ी है
गली सन्नाटे भरी है
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- पूर्णिमा वर्मन
१ दिसंबर २०२४

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