अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

            -सर्द हवाएँ

 
कहर लदे भूरे बादल को लाईं जो पश्चिम से
बरछी-सी चुभती हैं वे हिमगन्धी
सर्द हवाएँ

सन्नाटे को तोड़ रहा है खाँसी का ही ठसका
बूढ़ी बस्ती की ठठरी की हर पसली करक रही है
सूरज का स्वागत करने को जाने कौन बचेगा
बुझे अलावो के पास मौत गुपचुप सरक रही है

पता नही कब तक नुचना है व्यर्थ यहाँ गिद्धों से
द्वार बन्द हैं सभी स्वर्ग के
आग कहाँ से लाएँ?

धरती के बेटो के कोंपल से कोमल सपनो को
कुटिल भवों वाले शासक-सा कुहरा कुतर रहा है
दबा चोचं में उड़ जायेगा फिर खाकी क्षितिजो को
धूसर डैने फैला कर नभ नीचे उतर रहा है

क्या अंजाम घोसलों का तूफानों में होता है
पेड़ो के ठिठुरे तन कैसे
चिड़ियो को बतलाएँ

सीलन भरी कोठरी में बचपन थर-थर कँपता
अधसुलगी गीली लकड़ी से उठता सिर्फ धुआँ है
झीनी कथरी, गात सिकोड़े, मुरझाए सपने हैं
गाँव हुआ पाले की ज़द में अंधा एक कुआँ है

साँस-साँस-मौसम-को-गिरवी-चने,-मटर-या-सरसो-की
ऋण उगता है इन खेतों में
या बिखरी हुई व्यथाएँ

- राजेन्द्र गौतम
१ दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter