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            जाते-जाते दिसंबर
 

 
घुटने छाती से जुड़ने दे
नींदे रातों की उड़ने दे
बर्फ हो रहे प्राणों को अब
यमपुर के रस्ते मुडने दे
तू रह बन कर
कड़क दिसंबर

संधिवात पर मार कुल्हाड़ा
बदन दर्द का पढ़े पहाड़ा
निबल फेफड़ों के थैलों में,
भर दे क्रूर कठिनतम जाड़ा
तन के अंदर
तड़क दिसंबर

चुभा शीत का तीखा भाला
पड़ने दे फिर भीषण पाला
कर दे खत्म शेष है जितना
इस जीवन का मिर्च-मसाला
खुश होकर तू
फड़क दिसंबर

- सत्य
१ दिसंबर २०२४

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