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            अब का माघ

 
धन-ऋण गुणा-भाग ही करते
गुजर रहा है अबका माघ
इच्छाएँ बिखरी सड़कों पर
पाला मार गया है माघ

सर्द हवाएँ हुईं कँटीली
सूरज का बदला है रूप
समय नीड़ पर ठहर गया है
थोड़ी झलक रही है धूप
बरसों बाद लगा कि मौसम
आज हुआ है इतना घाघ

भुतहा पत्ते खड़ खड़ करते
दिखा रहे हैं अपनी शान
कंकड़ पत्थर खूब नुकीले
पैडगरी लगती वीरान
दुबका दुबका लगता जंगल
छिपे मांद में भालू बाघ

चुटकी भर थी मिली भलाई
मुट्ठी भर तन्हाई में
डूब गया है क़स्बा सारा
कम्बल शाल रजाई में
किन्तु बावरा मन अकुलाया
सारी ही सीमाएँ लाँघ

- श्रीधर आचार्य 'शील'
१ दिसंबर २०२४

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