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            प्रकृति वधूटी

 
बाँट रही है प्रकृति वधूटी हँसकर नेह प्रसाद
धूप खिली है इस आँगन में कई दिनों के बाद

सूरज ने मुँह छुपा लिया था उगी नहीं जब भोर
सबकी लगी टकटकी कबसे आसमान की ओर
बादल की सीढ़ी पर चढ़कर
लिखे कई परिवाद

बेघर होकर घूम रहे थे मौसम के सिरमौर
सुखद उर्मियों की तलाश में विहग न पाए ठौर
आवारा दिन सिकुड़ शीत से
करते थे फरियाद

सहमी कलियाँ अपना घूँघट नहीं सकीं तब खोल
घनी ओस की बूँदों ने जब बंद कर दिए बोल
सहज रश्मियाँ उनको आने
लगीं जोर से याद

बिखरी धूप थमाने आई नेह-प्रीति का पत्र
बिखर गया है स्वर्ण धरा पर यत्र-तत्र सर्वत्र
लूट रहे हैं मिलकर सारे
दिखा नही अपवाद

खुशियों की बारात चली तो चढ़ा प्रीति का रंग
स्वर्ण रश्मियाँ लगीं नाचने, उर हो गए मलंग
मन की पुस्तक पढ़कर चहका
हर्ष संग उन्माद

- प्रो. विश्वम्भर शुक्ल
१ दिसंबर २०२४

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