अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

चलो दिवाली आ गई

   



 

धर्म-कर्म यज्ञादि या, पूजन-पाठ विधान
दीप लगाकर ही मनुज, चढ़े नए सोपान

धूप, दीप, नैवेद्य औ’, पूजन-अर्चन मान्य
मगर मान्यता भाव की, भावों का प्राधान्य

राष्ट्र-धर्म की राह में, जो जन आए काम
अमर दीप हैं देश के, जन-जन करे सलाम

चलो दिवाली आ गई, पूछ-परख आरम्भ
वैवाहिक अवसर बने, लगे माँगलिक खम्भ

पीले चावल द्वार पर, रखे दिवाली माह
ढोल-ढमाके घोड़ियाँ, चालू हुए विवाह

दीप धरे दीवार पर, भरे सुनयना साँस
पिया बसे परदेस में, चुभी हृदय में फाँस

दीप प्रवाहित कर रही, गोरी नदिया तीर
मन में लेकर कामना, बदलेगी तकदीर

पूजन कर गोरी उठी, ले दीपों का थाल
जगमग-जगमग रोशनी, खुशियाँ हुईं निहाल

दो भागों में बाँटती, आँगन की दीवार
माँ ने दीपक धर दिया, बँटा नहीं फिर प्यार

बूढी माँ दीपक धरे, तुलसी चौरे पास
संभव है ये रोशनी, अंतस करे उजास

- प्रभु त्रिवेदी
१ नवंबर २०१५

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter