अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

और... यह जो पर्व का मौसम

   



 

और...
यह जो पर्व का मौसम
इसे, आओ, जगाएँ

रामजी कल अवध लौटे
उन्हें परजा मिली अंधी
महल के पिछले सिरे पर
राजलक्ष्मी मिली बंदी

काम आईं नहीं उनके
किसी भी ऋषि की दुआएँ

एक प्रतिमा यक्ष की है
उसे ही सब पूजते हैं
सोनहिरना ही घरों में
इन दिनों सब पालते हैं

ढोल रक्खा है असुरकुल का
चलो, हम भी बजाएँ

मंत्रिजन हैं कुटिल-छद्मी
हैं मुखौटे भरत धारे
गुणीजन लाये नये जो
दीप वे ही गये पारे

कभी दादी ने कहीं थीं
हुईं झूठी वे कथाएँ

- कुमार रवीन्द्र
१ नवंबर २०१५

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter