अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

क्या मैं भी मुस्काऊँ

   



 

अँधियारा ना छोड़े पीछा
कैसे इसे भगाऊँ?
सोच रही हूँ दीवाली पर
कैसे दिया जलाऊँ?

देख-देखकर खाली बोतल
मेरा जी जलता है!
जी जल-जलकर बुझता ऐसे
जैसे दिन ढलता है!

शाम तलक लेकर आएगा
भरी हुई बोतल!
उसकी बोतल देख-देखकर
कब तक मैं मुरझाऊँ?

बनिया रोज़ टोक देता है
करो उधारी चुकता!
नज़र मिला पाती ना उससे
मेरा सर भी झुकता!

ख़ुद तो खा-पीकर आएगा
हमको दे ठोकर!
उसकी ठोकर आज ठोंककर
क्या मैं भी मुस्काऊँ?

- रावेंद्रकुमार रवि
१ नवंबर २०१५

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter