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अब की बार दिवाली कैसी

   



 

सरहद पर घनघोर अँधेरा
अब की बार दिवाली कैसी?

देश जंग से जूझ रहा है
नेक इरादे बूझ रहा है
आघातों की मार पड़ी है
विपदा भी तो जमी खड़ी है

तांडव मचा हुआ सरहद पर
कहाँ खुशी खुशहाली कैसी?

शहीद माँ के लाल हुए हैं
सूने सब के भाल हुए हैं
माथे पर ना बिंदिया दिखती
हाथों में ना मेंहदी रचती

रीत गईं मन की आशाएँ
खाली और बहाली कैसी?

सरहद पर गोले बारूदी
जंग की है चिंगारी कूदी
धूल धूसरित कर मानेंगे
धता बता कर ही जानेंगे

सैनिक हैं हम तो हैं प्रहरी
हिम्मत सही जुटाली कैसी?

- आभा सक्सेना
१५ अक्तूबर २०१६
   

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