अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

दिये के तले भी रहे ना अँधेरा

   



 

करो आज जगमग
दसों ही दिशायें
दिये के तले भी रहे ना अँधेरा

छला आज
जल की सतह को किसी ने
नियम तोड़ बैठा अचानक समंदर
उठा ज्वार भाटा
बिना चाँदनी के
लहर ने कहा दुख सितारों से मिलकर

सहेजो ज़रा
प्रेम की मछलियों को
कि तट पर खडा है अभी तक मछेरा

पुरानी गली की
किसी कोठरी में
छुपे हैं अभी भी कपट द्वेष झाँसे
अमावस गले में
कसे एक फंदा
उखड़ने लगीं धूप की आज साँसें

सँभल कर बिताना
तमस की निशा को
झुके ना कहीं कल शरम से सवेरा

- संध्या सिंह  
१५ अक्तूबर २०१६
   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter