अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

जल रे दीपक

   



 

जल रे दीपक हौले हौले

चाहे तिमिर बढ़ाए घेरा
हटे न मन का कभी उजेरा
सत्य दीप से तन बुहार कर
मन की बात सभी से कह ले
अब नहिं कोई तम से दहले
जल रे दीपक
हौले हौले

हरदम तूफ़ानों से लड़ता
लौ फफका कर आगे बढ़ता
निष्ठा की वर्तिका बाल कर
उजियारे की नदी में बह ले
हिम्मत की पतवारें गह ले
जल रे दीपक
हौले हौले

- डॉ. सरस्वती माथुर
१५ अक्तूबर २०१६
   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter