अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर


दीप जलता रहे

   



 

नेह के ताप से, तम पिघलता रहे
दीप जलता रहे

शीश पर सिंधुजा का वरद हस्त हो
आसुरी शक्ति का, हौसला पस्त हो
लाभ-शुभ की, घरों में
बहुलता रहे
दीप जलता रहे

दृष्टि में ज्ञान-विज्ञान, का वास हो
नैन में, प्रीत का दर्श, उल्लास हो
चक्र-समृद्धि का, नित्य
चलता रहे
दीप जलता रहे

धान्य-धन, सम्पदा, नित्य बढ़ती रहे
बेल यश, की सदा उर्ध्व चढ़ती रहे
हर्ष से, बल्लियों दिल
उछलता रहे
दीप जलता रहे

हर कुटी के लिये एक संदीप हो
प्रज्ज्वलित प्रेम से, प्रेम का दीप हो
तोष, नीरोगता की
प्रबलता रहे
दीप जलता रहे

- मनोज जैन मधुर
१ अक्तूबर २०१७
   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter